परदे की कहानी
आओ एक अनोखी कहानी सुनाता हूँ,
इंसानों की की गई नादानी सुनाता हूँ,
तो सुनो की इंसानों
का क्या दर्जा था,
जब इस धरा पर हर एक शक्श बेपर्दा था.
तब आबरू शब्द न
रहा होगा ,
किसी ने भेद भाव न सहा होगा ,
किसी ने किसी का कुछ चुराया न होगा
किसी से किसी ने कुछ छुपाया न होगा.
तब किसी सभा मैं द्रोपदी न रोई होगी,
कोई नारी वस्त्रो मैं सम्मान न पिरोई होगी,
जब नग्नता उन्माद न जगती थी ,
तब नग्नता मैं लाज
न जाती थी.
तब अलंकारों से
ज्यादा महत्त्व बड़ा था,
असत्य भी बिना किसी
ओट खड़ा था.
तब नग्नता आत्मा की परतों तक छाई थी
जो नग्नता इस दौर मैं महावीर ने पायी थी.
फिर एक दिन डर मानव
मन मैं समाया
वही दिन था जब पर्दा अस्तित्वा मैं आया
फिर वो परत दर परत परदे लगता गया ,
वो खुद को एक अलग इन्सान बनता गया,
डर की वजह से उसने कभी पर्दा न उठाया
और वो भूल सा गया की उसने क्या था छुपाया ......
to be continude . . . . .